Wednesday, March 9, 2011

अपनी पिछली पोस्ट के बाद पता नहीं क्यूँ अचानक बहुत घबरा सी गयी. मन में एक डर बैठ गया  के लिखना मेरे बस की बात नहीं. मैं ऐसी कोशिश भी न करू. इस बीच कई बार इच्छा हुई की चलो, कुछ लिख कर देखते हैं, शायद लिख पाऊ.  पर "न लिख पाउंगी" ये डर लिखने ही नहीं दे रहा था. बहुत ही नेगटिव फीलिंग आ रही थी. बहुत उदास भी थी की अपने सपनो  को खुद उजाड़ रही हूँ. 
 
अभी भी बस यूँ ही उदास बैठी थी कि अचानक मेरी नज़र मेरी कलम पर गयी और कुछ समय के लिए उस पर ही टिक गयी. उसे देखते वक़्त लगा वो कह रही हैं कि " ईशा ! तुमने इतनी जल्दी हार कैसे मान ली, अभी तो तुम्हे मेरे साथ मिलकर बहुत कुछ लिखना बाकी हैं, यूँ हार मत मानो, फिर से लिखना शुरू कर दो. अच्छे बुरे कि चिंता किये बिना बस कुछ लिख दो."  मुझे भी एहसास हुआ कि " मैं नहीं लिख सकती" इतनी छोटी सी सोच के पीछे मैं अच्छा लिखने के सपने को सच करने कि कोशिश नहीं छोड़ सकती. फिर क्या, मैंने कलम उठाई और पिछले तीन-चार दिनों से न लिख पाने का जो दर्द महसूस कर रही थी,इसको ही कागज़ पर बयां कर दिया. इस दर्द कि पीड़ा बहुत अधिक  थी. मुझे अब भी नहीं पता के अपनी बीते चार दिनों के दर्द को मैं शब्दों में पिरो पा रही हूँ या नहीं,ये भी नहीं पता के जो लिख रही हूँ वो क्यूँ लिख रही हूँ, इसका उद्देश्य क्या हैं, पर इन सबसे ऊपर एक और चीज़ है वो है आत्मसंतुष्टि. मैं चाहे जैसा भी लिखू, पर लिखते लिखते मुझे पता पड़ रहा हैं के मैं खुद के करीब आ रही हूँ. मुझे अब ये पता चलने लगा हैं कि मुझमे क्या कमियाँ हैं, अब जो कोशिश करनी हैं वो इस बात कि इन कमियों को दूर कैसे किया जाए. 
 
टेढ़ी मेढ़ी लकीरे खींचनी तो शुरू कर दी हैं पर अभी कोई तस्वीर बनती नहीं दिख रही हैं पर मुझे अपने आप को व्यक्त कर के जो संतुष्टि मिल रही हैं उससे अपनी लेखनी के लिए एक बात तो तय कर सकती हूँ कि भले ही मेरा लिखना आप लोगो को निरुद्देश्य लगे पर मेरे लिए ये निष्फल नहीं हैं...मुझे जो आनंद और सुकून मिलता हैं वो शायद मेरे लिखने के आदत को बनाये रखने के लिए पर्याप्त हैं..

Friday, March 4, 2011

चाँद...एक सच्चा साथी



रात में फुर्सत के पलो में मैं अपने से ढेरो बाते करती थी. अपने सपने, दर्द, ख़ुशी,गलतियाँ सब कुछ खुद से कह देती थी. जब भी कोई पास नहीं होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि मैं अपने पास हमेशा रहती थी. आज से पहले कभी कोई ख़ामोशी महसूस ही नही होती थी. पर आज की ये रात ना जाने क्यूँ बहुत ख़ामोशी भरी और दर्द भरी लग रही हैं. बहुत कोशिश के बावजूद भी अपने से बात नहीं कर पा रही हूँ और ना ही अपने इस अजीब एहसास से संतुष्ट हो पा रही हूँ.  आज से पहले कभी कोई रात इतनी तन्हा नहीं थी के जुगनुओ का शोर भी सुनाई ना दे.


आज की रात तो ऐसा लग रहा हैं के घडी की सुई आगे ही नहीं बढ़ रही हैं. मैं जितना अगली सुबह के लिए तरस रही हूँ रात उतनी ही लम्बी होती दिख रही हैं.बार बार मोबाइल को उठा के समय देख रही हूँ और समय हैं की कछुए की चाल चल रहा हैं. ऐसा लग रहा हैं मानो समय अपाहिज हो गया हैं और मैं जिस रफ़्तार से भागना चाहती हूँ समय मेरा साथ नहीं दे पा रहा हैं. चारो तरफ फैला अँधेरा और इतनी गंभीर ख़ामोशी मुझमे सिहरन पैदा कर रही हैं. इस ख़ामोशी को सिर्फ मेरी सिसकियाँ ही तोड़ रही थी. इस रात ही मुझे पता पड़ा की मेरी आँखों की झोली में अश्को की बेशुमार दौलत हैं. मैं फूट कर रो रही थी क्यूंकि मुझे यकीन था की मेरी ये रुलाई ही इस ख़ामोशी को हरा सकती हैं. पर एक-आध घंटे बाद ये भ्रम भी टूट गया.


तभी मेरी नज़र दूर आसमान में बैठे हुए चाँद पर गयी. वो मेरी इजाज़त के बिना ही मेरे कमरे को अपने निर्मल प्रकाश से नहला रहा था. कभी पेड़ो के झुरमुट से तो कभी खिड़की से मेरी तरफ झांक रहा था. उसकी अठखेलिया और खिलखिलाहट मेरे उदास मन को बहला रही थी. उसकी शरारतो को देख कर सिसकियो के बीच ही मुझे अपनी हसी की एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी. फिर मैंने भी अपनी ख़ामोशी के सन्नाटे से पैदा हो रही सिहरन को दूर करने के लिए उसे अपने पास बुलाया. मेरे बुलाते ही वो छोटे बच्चे की तरह हँसता, उछलता हुआ मेरी बालकनी पर आ गया.


आते ही वो ढेरो प्रश्न पूछने लगा और मैं एक एक कर के बेबाकी से उसको सब प्रश्नों के जवाब देनी लगी. इस गुफ्तगू  में मैंने अपने अश्को कि बारिश से गम के तकिये को भिगो दिया. उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि मैं अब निर्भय होकर सांस ले पा रही हूँ. और जैसे-जैसे बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे उसकी चांदनी अधिक फैलती गयी. मुझे एहसास हुआ के ये चाँद का ही जादू हैं कि उसका उजाला मेरे भीतर तक उतर रहा है और मेरे अन्दर के अँधेरे को पोंछ रहा हैं और साथ ही मुझे एक नयी ताकत दे रहा हैं. खुद को जब थोडा संभला हुआ पाया तब जाना कि ये तो चांद का बड़प्पन ही हैं कि खुद को इतने तारो के बीच में तन्हा पाने के दर्द में डूबे होने के बाद वो मेरी खामोशियो को भी खुद में समां रहा हैं. मैंने जाना कि ये चाँद सिर्फ चाँद ही नहीं हैं बल्कि ये चोर हैं जिसने कुछ पलो में मेरे सारे गमो को चुरा कर अपना बना लिया. वह चाँद मेरे अन्दर के सारे अंधेरो और खामोशियो को खुद में समेटकर वापस फलक पर लौट गया. मुझे एक रौशन दुनिया में छोड़ कर वो वापस अपनी तन्हाइयो में लौट गया और मैं अगली सुबह सूरज की ओजमयी किरणों के साथ अपने ख्वाबो को सजाकर उन्हें हकीकत बनाने की जद्दोजहेद में जुट गयी. अब हर रोज़  रात में एक बार मेरी नज़र चाँद पर ज़रूर टिकती हैं और मैं उसकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए उसे शुक्रिया कहना नहीं भूलती.

Thursday, March 3, 2011

पत्रकारिता की पढाई करने लखीमपुर खीरी से लखनऊ आये कामता सिंह ने अपना कीमती समय निकाल कर अपने जीवन के कुछ ख़ास पहलु बाटे. उम्मीद हैं के आप सब उनके साथ हुई इन ख़ास बातो के ज़रिये उनसे रूबरू हो पायेंगे:

*कामता जी आपका जन्म स्थान और जन्म तिथि क्या हैं?
  मेरा जन्म १५-७-१९८९ को लखीमपुर खीरी में हुआ हैं.
*आपके शौक क्या हैं?
  मुझे किताबे पढना, क्रिकेट खेलना और संगीत सुनना पसंद हैं.
*किस तरह की किताबे पढना पसंद हैं आपको?
  ऐसी किताबे जो कुछ नया सिखाती हैं, जैसे- शिव खेडा की जीत आपकी.
*वर्ल्ड कप से क्या उम्मीदे हैं आपको?
  कुछ कहा नहीं जा सकता, वैसे मुझे लगता हैं की इंडिया प्रबल दावेदार हैं.
*आपने अपनी पढाई के लिए पत्रकारिता को ही क्यों चुना?
  मैंने इसलिए इसको चुना क्यूंकि पत्रकारिता मेरा जूनून हैं.
*जूनून, तो आप बताएँगे की किस तरह से आप अपने जूनून को इस क्षेत्र में साबित कर रहे
  हैं? 
  मैंने अखबारों में काम किया हैं, जैसे- यूनाईटेड  भारत. और मैंने मैगजीन में भी काम किया हैं. ये
  मेरा जूनून ही तो हैं.
*आपके निगेटिव और पोसिटिव पॉइंट्स क्या हैं?
 निगेटिव हैं की मैं सब पर आसानी से विश्वास कर लेता हूँ और पोसिटिव हैं की मैं खुद को
 सिचुऐशन के हिसाब से ढाल लेता हूँ.
  
*अगर आपको अपने आप में कोई एक चीज़ बदलनी पड़े तो आप क्या बदलेंगे?
 मैं परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाता, तो मैं खुद में यही बदलाव करना चाहूँगा.
*आप किसे अपना आदर्श मानते हैं?
  अपने माता-पिता को.
*आपका अपने माता-पिता को अपना आदर्श मानने की कोई ख़ास वजह.
  वो जिस तरह कठिनाइयों में जूझते हुए आगे बढे हैं मुझे ये बात बहुत प्रभावित करती हैं यही 
  कारण है की मेरा माता-पिता ही मेरे आदर्श हैं.
*आपके जीवन के सपने क्या हैं?
  मेरा सबसे बड़ा सपना हैं के मैं एक अच्छा टी.वी पत्रकार बनू.
*आज के समाज में पत्रकारिता भी एक व्यवसाय हो चुकी हैं तो आप किस तरह की 
  पत्रकारिता करना चाहेंगे व्यावसायिक या मिशन?
   मैं बीच का रास्ता चुनुँगा.
*बीच का रास्ता से क्या तात्पर्य हैं?
 (सर खुजाते हुए) वो मैं महसूस कर पा रहा हूँ शब्दों में व्यक्त नही कर पा रहा हूँ अभी आप बस इतना ही लिखे.
*यदि आप को एक दिन के लिए देश का प्रधानमन्त्री बना दिया जाए तो सबसे पहले आप  देश में व्याप्त कमियों में से किस कमी को हटाना चाहेंगे?
  मैं भ्रष्टाचार हटाना चाहूँगा पूरी तरह से. न घूस दो न लो. कह सकती हैं आप,मैं काया पलट कर  दूंगा ठीक वैसे ही जैसे अनिल कपूर ने नायक फिल्म में किया था.
*आप प्रधानमंत्री बन कर भ्रष्टाचार  हटाने की बात कर रहे हैं और खुद पत्रकारिता में बीच
  का रास्ता चुनने की बात कर रहे हैं, एक आम इंसान और एक प्रधानमन्त्री के रूप में
  विचारों में इतना फेर क्यूँ?
  आम इंसान की तरह जो सोचता हूँ वो बताया और एक प्रधानमन्त्री की तरह जो सोचा वो बताया
  अब आप अगला प्रश्न पूछिए.
*आपको किस तरह की जीवन संगिनी चाहिए?
  जिसमे सादगी हो.
*सादगी से आपका मतलब?
  जो संस्कारी हो.
*संस्कारी से आपका क्या तात्पर्य हैं?
  अरे मतलब जो परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारिया निभा सके.
*अगर आपकी जीवन संगिनी एक काम काजी महिला हो तो आपको कोई आपत्ति होगी?
 नहीं मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, बशर्ते की वो अपने काम के साथ साथ अपने संस्कारों को कायम
 रखे. मतलब वो आफिस से आने के बाद खाना बनाये, मेरे माता पिता का ध्यान रखे और उनके
 छोटे  मोटे कामो को थकने होने का बहाना बना कर ना टाले.
*समाज में जो महिला उत्पीडन बढ़ रहा हैं, उसके प्रति आपका क्या नजरिया और उसको 
 रोकने के लिए क्या योगदान हैं आपका?
 अभी तक तो मैंने कोई कदम नही उठाया हैं पर मौका मिला तो उसे रोकने की कोशिश करूँगा, 
 कागज और कलम की ताकत का इस्तेमाल करूँगा.
*अगर आप के सामने कुछ लड़के किसी राह चलती लड़की को छेड़ रहे हैं तो आप क्या 
  करेंगे?
  मैं उन लडको को घृणा की नजरो से देखूंगा.
*अभी तो आपने कहा था कि आपको मौका मिलेगा तो आप रोकने कि कोशिश करेंगे?
  ( घबराते हुए) अरे..अरे...क्या अब आप प्रश्न के उत्तर को बदल सकती हैं.?
*आपकी कोई गर्लफ्रेंड हैं?
  हाँ.
*उसका नाम, उसके बारे में कुछ बताए.
  नहीं, ये मेरा निजी मामला हैं.
*अगर आप किसी लड़की से प्यार करते हैं और आपके माता-पिता उस लड़की के लिए  नहीं राज़ी होते तो आप क्या करेंगे?
  मैं उस लड़की से ही शादी करूँगा चाहे भाग कर मंदिर में करू या कोर्ट में करू.
*अगर आपको इस दुनिया को कोई एक सलाह देनी हो तो वो क्या देंगे?
  हर व्यक्ति को खुद में सुधार करना चाहिए, जग खुद ही सुधर जायेगा.
*अगर आपको अपने बच्चो को अपनी कोई एक खूबी देनी हो तो वो कौन सी खूबी होगी?
  सोच समझ कर आगे बढ़ो और चलो.
*आपको अब तक को मिली हुई सबसे अच्छी सलाह.
  मुझे सलाह मिली थी कि जिस काम के लिए मना किया जाये वो ना करो.
*आपको किन बातो पर गुस्सा आता हैं?
  जब चीज़े मेरे अनुसार नहीं होती हैं,गुस्सा आता हैं.
*अगर आप कोई शेप/पेड़/जानवर होते तो कौन से होते और क्यों?
  आम का पेड़ क्योंकि आम फलो का राजा होता हैं.
*अगर आप के जीवन पर फिल्म बने तो आप किस एक्टर से लीड रोल करवाना चाहेंगे?
  शाहरुख़ खान.
*आपके जीवन पर कोई व्यक्ति अगर किताब लिखे तो आप उस किताब को क्या शीर्षक 
  देना चाहेंगे?
 ( सोचते हुए) मुझे समझ में नहीं आ रहा हैं.
*यदि आपको एक कमरा किसी एक चीज़ से भरा हुआ मिले तो वो कौन सी चीज़ हो 
  और क्यूँ? 
  (सर खुजाते हुए) नो कमेंट्स.
*आपकी फोटो अखबार में छप रही हो और आपको उसके ऊपर हेडलाइन देनी हो तो क्या 
 देंगे?
 (इधर उधर देखते हुए) नहीं समझ आ रहा.
*अगर आपको काले और सफ़ेद के अलावा एक ही रंग और दिखे तो वो कौन सा रंग 
 देखना चाहेंगे और क्यूँ?
 पिंक, क्योंकि वो प्यार को दर्शाता हैं.
*आप अपने अपोसिट सेक्स में सबसे पहले क्या देखते हैं?
 आँखे.
*अगर आपको अपना नाम बदलना हो तो क्या रखेंगे और क्यूँ?
  करन रखूँगा क्यूंकि मुझे पसंद हैं ये नाम.
*कोई एक बात जो लोग आपके बारे में नहीं जानते हो?
  यही के मैं बहुत मजाकिया हूँ.
*अपने आपको तीन शब्दों में व्यक्त करिए.
 १-आत्मविश्वासी, २- सच बोलने वाला, ३- दुसरे के झासे में आसानी से आने वाला.
*आपको अक्सर रात में सोने के एकदम पहले और सुबह उठते ही सबसे पहला क्या 
 विचार आता हैं?
 सोने से पहले- अगले दिन क्या करना हैं ये सोचता हूँ. उठते ही इश्वर को धन्यवाद करता हूँ कि एक 
 और सुबह दिखाई मुझको.
*आप किस तरह की मृत्यु पाना पसंद करेंगे?
  वैसे तो मैं चाहता हूँ की मैं मरू ही नहीं, और वैसे भी ये तो इश्वर के ऊपर हैं मैं क्या बताऊ?

*रैपिड फायर राउंड ( बोल्ड वर्ड कामता जी का जवाब हैं)
 एप्पल जूस / ओरंज जूस
 सेक्स / लव
 स्वीट / सोल्टी
 मूवी / पब 
 १ करोड़ रूपये / सच्चा प्यार
 साड़ी / जींस
 फेम / मनी 

Sunday, February 27, 2011

सिनेमा में दलित

भारतीय परिवेश के तमाम क्षेत्रों  के समान ही सिनेमा के क्षेत्र में भी दलितों की स्थिति निरीह एवं लाचार हैं. भारतीय सिनेमा का नजरिया भी दलितों के प्रति कुछ खास भिन्न नहीं है. दलितों के प्रति करूणा दिखाकर भारतीय फिल्म निर्माता एवं निर्देशक अछूत कन्या, आदमी, अछूत, सुजाता, बूटपालिश, अंकुर,सदगति, वेलकम तो सज्जनपुर, पीपली लाइव, आक्रोश, भीम गर्जना, और राजनीति जैसी फिल्मों का निर्माण तो किया हैं और इनमे से कुछ फिल्मो में दलितों को केंद्र में और कुछ में सहयोगी भूमिका में दलित के चरित्र को दर्शाया भी गया हैं परन्तु जिस गंभीरता और शिद्दत से दलित जाति के प्रश्न को उठाए जाने की जरूरत है, उस तरह से इन फिल्मो ने उसको नहीं उठाया गया हैं.

हिन्दी सिनेमा के कुछ ठोस यथार्थ हैं- नौकर का नाम दीनु या रामू ही होगा, बहुत होगा तो उसके नाम के साथ काका भी जोड़ दिया जाएगा. बेशक दलित यथार्थ हिन्दी सिनेमा में पर्याप्त जगह प्राप्त नहीं कर पाया है. भारत में प्रतिरोध का सिनेमा अनुपस्थित है, फिल्मों में असली भारत कम ही दिखता है, फिल्मों में काम करने वालों में भारत की विविधता नहीं दिखती.फिल्मों में दलित हमेशा लाचार ही होता है, जबकि पिछले तीन-चार दशक भारत के दलितों के लिए प्रतिरोध के दशक रहे हैं. दलित लगान में कचरा क्यों  होता है, दलित दिल्ली-6 की जमादारिन क्यों हैं, जिससे दुधमुंहे बच्चे कहते हैं कि तुम सबको बड़ा बनाती हो, हमें भी बड़ा बना दो. यह मजाक किसी पुजारिन के साथ भी तो किया जा सकता था, लेकिन नहीं, यह नहीं हो सकता.  इसके साथ ही हम सुजाता फिल्म की अछूत-दलित कन्या सुजाता की दयनीय चित्रण को कैसे भूल सकते हैं.फिल्म में सुजाता नाम की दलित कन्या चुप रहनेवाली, गुनी, सुशील और त्यागी ‘मैरिज-मैरिटल’ यानी सेविका बनी  है जबकि उसी परिवार-परिवेश की असली बेटी एक प्रतिभावान मंचीय नर्तकी, आधुनिका, वाचाल और अपनी मर्जी की इज्जत करनेवाली शख्सियत बनती है.  हमारी फिल्मे दलितों को सबल दिखाने में हमेशा ही परहेज करती आई हैं और उसका एक सशक्त उदाहरण प्रकाश झा की नयी फिल्म राजनीति में देखा जा सकता हैं. दलितों का नेता ‘सूरज’ (अजय देवगन), जो भरी सभा में सवर्णों और ऊंचे लोगों से लोहा लेता दिखाई देता है, आखिर वह भी उसी सवर्ण परिवार में जन्मा हुआ साबित होता है. अंततः फिल्म इसी परिपाटी पर लौट आती है कि दलितों का वह मसीहा इसी कारण से इतनी घाघ राजनीति कर सका क्यूंकि उसके अन्दर उसी राजनीतिक खानदान का खून था. फिल्म की कहानी का आधार कुछ भी रहा हो, लेकिन यह सत्य है कि फिल्म समाज की दलितों के प्रति इसी तस्वीर को पुष्ट करती है किसी दलित में स्वाभाविक रूप से वर्चस्ववादी लोगों का सामना करने का साहस ही नहीं है. हमारी फिल्मो में दलितों को सबल दिखाने से परहेज क्यों किया जाता हैं? भारतीय सवर्ण  दलितों से जितनी नफरत करते हैं, उतनी नफरत अमेरिका में अश्वेतों से भी नहीं की जाती.

सवाल दलितों पर फ़िल्में बनाने का नहीं है, सवाल ये है की वे जब परदे पर उतारे जाते हैं तो किस तरह का चरित्र उनमें उभारा जाता है. ज़रा सोचिये कि आत्म-बोध, आत्म-सम्मान, मनुष्यगत-अस्मिता, स्वाभिमान जैसे गुण उसमें क्यूँ नहीं होते? वह अपने तिरस्कार पर ख़ुद क्यों चीत्कार करता नहीं दिखता? वह अपने प्रति हर ज़्यादती-अत्याचार को आत्मसात करनेवाला ही क्यों है? उसकी ये छवि उसके असल जीवन में अत्याचारों के विरुद्ध उठाए प्रतिकारों-चीत्कारों को ख़ारिज करती है. उसके आत्म-सम्मान के संघर्ष को नकारती है.

जातिगत दृष्टिकोण और अन्याय का प्रतिकार करने वाली अभी तक की सबसे  सशक्त फिल्म बेंडिट क्वीन  ही दिखाई देती हैं जो साधारण दलित स्त्री से दस्यु सुंदरी और फिर फिर सांसद बनी फूलन देवी पर आधारित थी. इसके अलावा शायद ही कोई ऐसी फिल्म हैं जिसने दलित प्रश्न को ठीक ढंग से छुआ तक हो.

खैर..सिनेमा में दलित की स्थिति का वर्णन करने के बाद बस इतना ही कहना चाहूंगी की सिनेमा में दलित बहस का मुद्दा ना होकर सामाजिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग हैं और इसके लिए किसी बहस की ज़रुरत नहीं बल्कि सही मायनों में इसके उत्थान, विकास और सशक्तिकरण के लिए कुछ करने की ज़रुरत हैं. वैश्वीकरण और आधुनिकता की इस बयार  में हम सबको यही कोशिश करनी चाहिए की समाज में दलित समुदाय की पहचान की नयी चेतना जागृत कर सके और इनको  हर क्षेत्र में सशक्त पहचान  दिलाई जा सके.

( विभिन्न वेबसाइट्स पर मिली जानकारी से ये पोस्ट संभव हो पायी हैं.)

Friday, February 25, 2011

लिखना, लिखने से ही आता हैं



इन दिनों हमारे डिपार्टमेंट के सभी स्टुडेंट्स को लिखने की धुन सवार हैं. कोई भी कुछ भी लिख रहा हैं. कुछ बहुत अच्छा और गंभीर तो कुछ हल्का फुल्का लिख रहे हैं. पर मज़े की बात ये हैं की सभी लिख रहे हैं. स्टुडेंट्स की इस लिखने की कोशिश की शुरुवात करने के पीछे मुकुल सर की अहम भूमिका हैं. सर के इस दिखाए हुए रास्ते पर सभी स्टुडेंट्स चलने की पूरी कोशिश कर रहे है और वो भी हम सबकी पोस्ट को रेगुलर पढने और उसपर अपने सुझाव देने के अपने वादे को पूरी तरह निभा रहे हैं.

सभी के मन में ना जाने कितना कुछ चल रहा होता हैं पर उसको शब्दों में व्यक्त करना कितना मुश्किल काम हैं ये तभी महसूस होता हैं जब कुछ लिखने बैठो. जब कोई स्टुडेंट कुछ नया लिख कर पोस्ट करता हैं तो उसको सर के कमेन्ट का इंतज़ार ठीक वैसे ही रहता हैं जैसे किसानो को अपनी फसल के लिए बारिश का इंतज़ार रहता हैं. हर रोज़ कॉलेज में मिलने पर सभी एक दुसरे से एक ही बात पूछते मिलते हैं " यार तेरी पोस्ट पर सर का कमेन्ट आया? क्या लिखा सर ने? वगेरह वगेरह..." और अगर सर ने किसी पोस्ट पर कुछ बहुत अच्छा कमेन्ट किया तब तो वो स्टुडेंट तोताराम कैंटीन की चाय पूरी क्लास को पिलाता हैं. स्टुडेंट्स की अच्छे कमेन्ट पाने की यह ख़ुशी पहले बोर्ड एग्जाम में अच्छे नंबर पाने जैसी होती हैं. इस ख़ुशी के साथ ही साथ ज़िम्मेदारी होती हैं एक और बेहतरीन पोस्ट ब्लॉग पर डालने की और फिर से सर का उम्दा कमेन्ट पाने की.

पर इसके साथ साथ उन लोगो को भी नही भूला जा सकता जो सर के एक अच्छे कमेन्ट के लिए तरसते नज़र आते हैं और अपने पोस्ट पर उनके सुझाव पाने के बाद और कुछ अच्छा लिखने की कवायद शुरू कर देते हैं. बड़ी अजीब फीलिंग होती हैं जब कोई स्टुडेंट अपनी पूरी मेहनत से अपने अकोर्डिंग कुछ बहुत अच्छा लिख कर पोस्ट करे और वो सर को पसंद ना आये. एक पल के लिए तो ऐसा लगता हैं लिखने की पूरी मेहनत व्यर्थ हो गयी. फिर उसी पोस्ट पर दोस्तों के चाहे जितने भी अच्छे कमेन्ट आ जाए मन संतुष्ट नही होता. कनडिशन कुछ वैसी ही होती हैं जैसे कोई पेरेंट्स अपने बच्चे की बेहतरी के लिए उसे डाटे और उसका खराब मूड देख कर उसके दोस्त यार उसका दिल बहलाने की कोशिश करे. खैर..उस कमेन्ट का शोक कुछ ही पल का होता हैं वैसे भी हमें सिखाया गया हैं कि " ठण्ड और बेईज्ज़ती जितनी महसूस करो उतनी अधिक लगती है." इसलिए उस पोस्ट को ज्यादा फील करने का मतलब नहीं बनता.  मतलब बनता हैं उस कोशिश को ज़ारी रखने का क्योंकि लिखना, लिखने से ही आता हैं.

लिखने की इस रेस में सभी शामिल हैं. सभी स्टुडेंट्स दस्तक देते हुए बिंदास सोच कर कुछ अनकही तो कुछ बिंदास बोलने की  पहल कर चुके हैं. हर कोई अपने भाव-अनुभव को खूबसूरत शब्दों में पिरोने की पूरी कोशिश कर रहा हैं.  कभी किसी की माला बनती तो किसी के मोती बिखरते दिखते हैं.कोई इस समुन्द्र में डूबता तो कोई तैरता दिखता हैं, किसी की आशा का गुब्बारा फूलता तो किसी का पिचकता दिखता हैं. इन सभी आशाओं और निराशाओं के बीच जो बात सबसे अच्छी हैं वो हैं कि हम सभी स्टुडेंट्स इस दौड़ में शामिल हैं और अब चाहे हम जीते या हारे पर एक गम नहीं होगा के हमने कोशिश नहीं की.

इस कोशिश से पहले हम सभी एक ऐसी रेलगाड़ी के डिब्बे थे जिसमे इंजन ना होने के कारण वो एक ही जगह खड़ी हुई थी पर सर ने  इसमें इंजन फिट कर दिया हैं अब रेलगाड़ी ने चलना तो शुरू कर दिया हैं पर ये मंजिल पर पहुचेगी या बीच में ही पटरी से उतर जायेगी ये समय के साथ ही पता चलेगा. फिलहाल तो यह सफ़र बहुत सुहाना लग रहा हैं और हम सभी इस सफ़र की सुहानी यादो को अपने अपने ब्लॉग में पोस्ट करते (कैद करते) चल रहे हैं. कल हम जहाँ भी हो, पर जब भी हम अपने इस सफ़र को दुबारा जियेंगे, और अपने पोस्ट और सर के कमेंट्स को पढेंगे तो आँखों में नमी और होठो पर एक मीठी मुस्कान ज़रूर होगी और अगर हमारी गाड़ी पटरी से उतर भी गयी होगी तो सर की बात "लिखना, लिखने से ही आता हैं" फिर से लिखने की कोशिश करने के लिए प्रेरित कर देगी और हमारी यह लगातार कोशिश हम सबको भी अपनी अपनी मंजिलो पर ज़रूर पंहुचा देगी. जहाँ पहुंचकर हम भी कह सकेंगे की हाँ ! "लिखना, लिखने से ही आता हैं" .

Thursday, February 24, 2011

दोस्ती बड़ी ही हसीं हैं..

दोस्तों के साथ मुस्कुराना,
उदास हो वो तो हसाना,
बंक कर के कोरिडोर में बतियाना,
कैंटीन का  बिल उनके नाम बनवाना,
गर्लफ्रेंड  के नाम से उनको चिढाना,
बात बात पर उनको सताना,
जीतते चेस को हार जाना,
उनके लिए किसी से भी भिड़ जाना,
दिल के हर राज़ कह जाना,
गिले शिकवो का आंसुओ में बह जाना,
लेक्चर के बीच में पर्चिया बनाना,
पढ़ कर उनको ठहाके लगाना,
शैतानिया कर के उनको फंसाना,
क्लास से फिर बहार निकलवाना,
बहाना करके लू का,
खुद भी चलते लेक्चर को छोड़ जाना,
आते जाते टीचरस का मजाक उडाना,
पकडे जाने पर हसीं दबाना,
हर बात पर शर्त लगाना,
हारने पर मुकर जाना,
प्रोजेक्ट के नाम पर देर से घर जाना,
एग्जाम नाईट पर टापिक्स समझाना,
रिजल्ट आने पर
साथ में आंसू बहाना,
बर्थ-डे पर मुह पर केक लगाना,
बन्दर बन कर फिर फोटो खिचवाना,
बिछड़ने पर आंसुओ का गिर जाना,
"आँख में कंकर चला गया" बहाना लगाना,
दोस्त का फिर गले लग जाना,
दोस्त! तुमसे ही हैं ये सफ़र सुहाना,
दूर होकर हमको भूल ना जाना.

Sunday, February 20, 2011

प्रादेशिक फल, शाकभाजी एवं पुष्प प्रदर्शनी-२०११

लखनऊ, २१  फ़रवरी : राजभवन उद्यान में पिछले दो दिनों से चल रही प्रादेशिक फल, शाकभाजी एवं पुष्प प्रदर्शनी लखनऊवासियों के आकर्षण का केद्र बनी हुई थी. उद्यान के मध्य में सजे विभिन्न तरह के पुष्प और लगातार बजता मधुर संगीत लोगो के मन को खूब लुभा रहा था. प्रदर्शनी में प्रवेश टिकट मात्र ५ रूपये होने के कारण सभी वर्ग के लोगो ने  आसानी से इसका आनंद उठाया. पुलिस विभाग के श्री इन्द्रजीत सिंह रावत की देख रेख में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद थी. कल रविवार होने के कारण आगंतुको की संख्या अधिक थी. प्रदर्शनी में कैंटीन वा पीने के पानी की उचित व्यवस्था थी.
प्रदर्शनी में कुल ११३७ प्रतियोगियों ने ५१२८ पौधों का प्रदर्शन किया था. ४५ वर्गों में विभाजित प्रतियोगिताओं में राजभवन, मुख्यामंत्री  आवास, आर्मी, प.ए.सी, उत्तर प्रदेश रेलवे, एच.ए.एल, लखनऊ विकास प्राधिकरण, लखनऊ नगर निगम ने भाग लिया था. विजेताओं को कल राज्यपाल बी.एल.जोशी ने शील्ड, ट्राफी व कप सहित नगद पुरूस्कार देकर सम्मानित किया.
बायोटेक पार्क (लखनऊ), नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय (फैजाबाद), धन्वन्तरी वाटिका राजभवन, राज्य ओद्योगिक मिशन (उ.प्र), भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (वाराणसी), उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग (उ.प्र), केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (मेरठ), राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (लखनऊ)  ने प्रदर्शनी में अपने अपने स्टाल्स लगा रखे थे. प्रत्येक स्टाल का अपना ही महत्व था. नरेन्द्र देव (फैजाबाद) स्टाल पर ६ फीट की लौकी को देखने वालो की भीड़ जमा थी. सब्जियों की अलग अलग प्राजातियों जैसे- सफ़ेद आलू, लाल आलू, गाजर देसी, गाजर विलायती, हाइब्रिड शाकभाजी के बारे में भी लोगो ने जानकारी ली.कोई स्टाल कृषि विविधिकरण परियोजनाओं के विषय में जानकारी दे रहा था तो कुछ स्टाल्स पर लोग  फूलो, फलो वा सब्जियों (मूली, बैंगन,खरबूजा,भिन्डी) की वैज्ञानिक विधियों से खेती एवं उनके भंडारण वा सुरक्षण की जानकारी लेते दिखे. कुछ आगंतुको का रुझान आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों की जानकारी लेने की ओर था.

सब्जियों द्वारा निर्मित आकृति से दिया गया सन्देश 
"घड़ियाल बचाओ" 
शाक, भाजी, तरकारी द्वारा विभिन्न प्रकार की श्रेष्ठ आकृतियों की रचना कर के जो सन्देश जनता को दिया गया वो अत्यंत सराहनीय था.  इन आकृतियों द्वारा "नो मोर एड्स", "माँ सरस्वती का श्रृंगार करता बसंत", "अमन की आशा", मेरा भारत महान", "पेड़ बचाओ", "ग्रामीण भारत", "छोटा परिवार ,सुखी परिवार", "सर्वधर्म समभाव", "पृथ्वी बचाओ", "उड़ना मुझसे सीखो", "कागज़ का थैला इस्तेमाल करो", "आतंकवाद ख़त्म करो", "घड़ियाल बचाओ" जैसे सन्देश देकर जनता को जागरूक करने का प्रयत्त्न किया गया.जिला कारागार, रायबरेली द्वारा ५४ सब्जियों की मिश्रित डाली की आकृति आगंतुको को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी.

अलग अलग प्रकार के फूलो ने अलग ही  छटा बिखेर रखी थी.फूलो की विभिन्न दुर्लभ प्रजातियाँ 
पुष्प सिनरेरिया के समूह के पास फोटो
 खिचवाती आगंतुक
उबलब्ध थी.फ्लास्क, वेनेडियम, मेरीगोल्ड अफ्रीकन, लैनेरिया, कारनेशन, लयूपिन, लाईनम, जिप्सोकिल फूल देखने में बहुत ही मनमोहक लग रहे थे. फूलो की सुरक्षा के लिए जगह जगह पर माली बैठे थे. राष्ट्रीय उद्यान की तरफ से छोटे एवं बड़े इमामबाड़े के पुष्प सिनरेरिया को समूह में कलात्मक ढंग से ३ मीटर व्यास में सजाया गया था. सिनरेरिया के समूह के पास आगंतुको ने फोटो खिचवाई. गुलाब की अलग अलग प्रजातियाँ, प्रतियोगिता के लिए केले की छाल वा रंग बिरंगे फूलो से सजे मंडप, मौसमी फूल वा मंजू वर्मा द्वारा लगी सब्जियां लोगो को खूब लुभा रही थी. इतने खूबसूरत पारिदृश्य के साथ साथ उद्यान में चलता फव्वारा इसकी खूबसूरती को दुगना कर रहा था.

बाहर की तरफ लगे व्यावसायिक स्टाल्स पर लोगो ने जम कर खाद, फूलो वा सब्जियों के गमलो की खरीददारी की. आगंतुक राम मनोहर ने कहा की "सब्जी वा तरकारी द्वारा लोगो को जो सन्देश देने का जो तरीका है वो उनको बहुत भाया."  प्लांट साइंस की छात्रा राधिका ने कहा " मुझे यहाँ पर आकर अपने विषय से सम्बंधित कई बाते जानने को मिली."  चंद फल और सब्जियों द्वारा दिए जाने वाले सन्देश इस बात को दर्शाता दिखा की हमारे देश में सुधार की कितनी अधिक आवश्यकता हैं. दो दिन तक चली इस प्रदर्शनी ने समाज सुधार सम्बंधित सन्देश देते हुए बच्चो, युवाओ वा बुजुर्गो को खूब लुभाया.