Tuesday, February 15, 2011

काश वक़्त को पीछे मोड़ पाते

काश वक़्त को पीछे मोड़ पाते,
छूटे रिश्तो को वापस जोड़ पाते,
छोटी - छोटी खुशियों का वो जहाँ,
आस-पास दिखता है अब कहाँ?
बिन बात का वो मुस्कुराना,
हर घडी दोस्तों का सताना,
ना कुछ सुनना, न सुनाना,
बस पापा से अपनी जिद मनवाना,
वो रात भर जाग कर पढना,
भाई से बे-मतलब लड़ना,
कभी घुटने कभी कोहनी का छिलना,
फिर भी होता था गैंग से मिलना,
उन यादो का यूँ गुदगुदाना,
दिल का यह यूँ कह जाना,
काश वक़्त को पीछे मोड़ पाते,
छूटे रिश्तो को वापस जोड़ पाते.

Monday, February 14, 2011

शायद यही हैं प्यार

प्यार क्या होता हैं?
प्यार क्यूँ होता हैं?
प्यार कैसे होता हैं?
प्यार कब और किससे होता हैं?
क्या परिभाषा हैं इसकी?
या परिभाषा रहित हैं प्यार?
कुछ समझ में नही आता,
जो समझ में आता हैं वो हैं
किसी की हँसी में आपकी ख़ुशी,
किसी के गम में आपका साथ,
आपकी दुआ में उसका होना,
आपके जीवन में उसका एहसास,
एक मीठा, नि:स्वार्थ भाव,
जिसके होने इस अन्धकार रौशनी लगे,
जिसकी आवाज़ भरी महफ़िल में भी
स्पष्ट सुनाई पड़े,
जिसके होने से खुद के होने का एहसास हो,
जिसकी एक आवाज़ से आप जीवन जी जाए,
जिसके छूने से मृत्यु का भय भी दूर हो जाए,
शायद यही हैं प्यार !!!

क्या यहीं प्यार हैं

आज हृदय में कुछ ऐसे भाव उठते हैं,
जिन्हें महसूस करते ही,
पलक झपक जाती हैं,
शर्म सी आ जाती हैं,
बेठे बेठे यकायक
खिलखिलाने लगती हूँ,
अपने बालो को खुद ही
सहलाने लगती हूँ,
खिड़की पर खड़े होकर
चाँद से बातें करती हूँ,
उसे खोने के एहसास से डरती हूँ,
जानती हूँ कि पाया नहीं है उसको,
पर अनजान नहीं हैं
क्योंकि स्वयं को दे दिया उसको,
मैंने तो उसे अपना मान लिया,
नहीं कहती कि उसने मुझे जान लिया,
मेरा तो यह निस्वार्थ भाव हैं,
शायद उस भाव का उसमे अभाव हैं,
पर विश्वास हैं मुझे अपने भावनाओं पर,
यह स्वच्छ हैं,
अछूती है वासनाओं से,
मेरे अंतर:मन को पता हैं
वह स्वयं आगे बढेगा,
मेरे कुछ कहने से पहले
अपने शब्द गढ़ेगा,
उस वक़्त मैं अपने
समस्त भाव उसे कह दूंगी,
हमारा आजीवन तक का साथ हैं,
यह विश्वास उसे दे दूंगी.

Thursday, February 10, 2011

पहचान तो आखिर पहचान होती हैं..

आज के समय में पहचान की जरूरत तो सभी को होती हैं. वह पहचान चाहे किसी अच्छे काम से मिले या बुरे काम से. बस पहचान मिलनी चाहिए. यह बात तो आज भारत देश की आम जनता भी मानने से इनकार नही करेगी की जिस तरह से हमारा देश,विश्व में अपनी अलग पहचान बना रहा हैं वह कोई आसान काम नही हैं. आज चारो ओर हमारे देश और उसको चलाने वालो या कहे घसीटने वालो की चर्चा हो रही हैं.
 
 
कई महान व्यक्तित्वों ने देश का नाम रोशन किया हैं और जिस तरह से आम जनता उनके इस कारनामो से शांत हैं उससे ऐसा लगता हैं की वो उन महान व्यक्तित्वों के प्रति कृतज्ञ हैं. यह तो मेरा मानना हैं, यह भी हो सकता हैं की यह जनता की मूर्खता हो या फिर गूंगापन हो. खैर...मुद्दा तो देश को सफेदी की जो चमकार मिल रही है उसका हैं इतनी चमकदार सफेदी तो शायद रिन साबुन भी कपड़ो को नहीं दे पाती होगी.
 
 
देश के प्रति कई लोगो ने अपने कर्तव्यों का पूर्ण निर्वाह किया हैं जैसे - सुरेश कलमाड़ी, ए.राजा, मनमोहन सिंह, अशोक चव्हाण, येदुरप्पा और ना जाने कितने ही ऐसी हस्तिया हैं जो देश को विश्व प्रसिद्द बनाने में कोई कसर नही छोड़ रही हैं. इन हस्तियों ने तो फिर भी अपने नाम जनता के सामने पेश हो जाने दिए ऐसे न जाने कितने ही महान लोग होंगे जो देश को चमकाने के बावजूद भी अपना नाम उजागर नहीं कर रहे होंगे. अरे!! वही तो हैं जो सही मायनों में महान हैं या कहे भगवान् हैं. काम तो बड़े बड़े कर रहे हैं पर अपने दर्शन नहीं देते हैं. वो तो कुछ तकनीकी खराबी (बढती मीडिया तकनीक) के कारण उनके नाम प्रकट हो जाते हैं. इन सभी ने देश को खूब चमकाया, कभी राष्ट्रमंडल खेलो के दौरान, कभी भूमि के आबंटन के नाम पर, कभी मोबाइल तकनीक (२-जी स्पेक्ट्रम) के ज़रिये,कभी देश के धन को विदेशी बैंको ( काला धन मामला) को देकर,कभी जनता को आरामदेह ज़िन्दगी ( बेरोज़गारी) देकर,कभी महान व्यक्तित्वों ( थामस) को उच्च पदों पर नियुक्त कर के. यह तो बहुत छोटी सी लिस्ट हैं, महान नामो के साथ ही ऐसे ही ना जाने कितने महान कारनामे जनता से छुपाये जा रहे होंगे. यह तो हम लोगो को उस तकनीकी खराबी को शुक्रिया अदा करना चाहिए जिसके चलते देश को चलाने वाले कुछ भगवानो और उनके कारनामो को उजागर किया जा रहा हैं.
 
 
पर एक बात तो तय हैं की यह भगवान् इसी तरह रिन साबुन देश को चमकाने के लिए घिसते रहे तो देश चमकते-चमकते फटीचर हो जाएगा. पर क्या हुआ...देश को विश्व में पहचान तो मिलेगी क्योंकि पहचान तो आखिर पहचान होती हैं.

Wednesday, February 9, 2011

बस कुछ लिखने के लिए...

अब सर की दी हुई प्रेरणा से हर रोज़ कुछ न कुछ लिखने का मन करता हैं. भले ही जैसा भी लिखू बस लिखू. एक आस होती हैं के कुछ लिख जाऊ. अब जब पछले ३-४ दिनों से ये आशा बरकरार है तो यह एहसास हो रहा हैं की लिखने का भी अपना मज़ा हैं. लिखने के बाद जब पढो तो लगता है की जिंदगी के कितने पहलु ऐसे हैं जो लिखते वक़्त तो लिख जाओ पर कभी यूँ बैठ कर उन पहलुओ पर विचार ही नहीं किया.
दिल तो बच्चा है जी, तो बस आज बैठे बैठे यूँ ही अपने मोबाइल से खुद के नंबर पर कॉल लगा रही थी और नंबर व्यस्त बता रहा था तभी मन में एक ख्याल कौंधा के मेरा नंबर हैं औरो को तो एक झटके में मिल जाता हैं  और मेरे लिए ही व्यस्त हैं. जिंदगी भी कुछ ऐसी ही हो गयी हैं, इधर उधर की व्यस्तताओं में अपनी जिंदगी के लिए तो वक़्त ही नहीं मिलता. अकेले में बैठ कर खुद से बातें किये हुए तो एक ज़माना हो गया हैं. अपने बारे में सोच ही रही थी की अचनाक फिर कोई और उस पर हावी हो गया. क्या करे, मन इतना चंचल जो हैं. ख्याल आया की कुछ दिनों में वेलेनटाइन डे आने वाला हैं और मुझे भी इस दिन को मनाने के लिए वेलेनटाइन चाहिए. अपने इस ख्याल को पूरा संजो भी नहीं पायी  थी की अचानक अगला ख्याल मन में कूदने लगा. ऐसा लगा जैसे एक ख्याल के साथ ख्यालो का ढेर मुफ्त. वेलेनटाइन डे तो बाद में मनाउंगी पहले पढाई तो कर लू. कुछ समय बाद एग्जाम  हैं. फिर ख्याल आया के इस एग्जाम के चक्कर में पढ़ कर ज़िन्दगी के एग्जाम को कैसे भूल जाऊ. इस ज़िन्दगी के एग्जाम का ना तो कोई फिक्स्ड सिलेबस होता हैं और ना ही  परीक्षा के तारीख तय होती हैं.  ये तो हर घडी अपना रूप बदलती हैं. कभी धूप तो कभी छाव, कभी दिन तो कभी रात.
इतना भारी भरकम सोचते ही अगला ख्याल आया की क्यों ज़िन्दगी में इतनी तकलीफे उठाई जाए आखिरकार तो मरना ही हैं. फिर वही घिसे पिटे सवाल मन में उठे. मेरे मरने के बाद क्या कोई मुझको याद करेगा? करेगा तो क्यूँ करेगा, वगेरह वगेरह...
फिर सोचा................................................
फिर कुछ नहीं सोच पाई....
बस आज इतने ही ऊट-पटांग ख्याल मन में आये.अगली बार जब और भी ऐसे ख्याल आयेंगे तो फिर से उनको शब्दों में संजोने की कोशिश करुँगी.

Monday, February 7, 2011

पुस्तक प्रेमियों को लुभाता पुस्तक मेला

लखनऊ, ७ फरवरी : "नेशनल बुक ट्रस्ट" दिल्ली द्वारा उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और लखनऊ विश्वविद्यालय  वा जिला प्रशासन के सहयोग से लखनऊ विश्वविद्यालय के टेनिस मैदान में आयोजित पुस्तक मेला पुस्तक प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ हैं. इसका उदघाटन शनिवार ५ फरवरी को भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष गोपाल चतुर्वेदी, साहित्यकार प्रो. बैजनाथ सिंह, लविवि के हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष  डॉ. सरला शुक्ला और समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख डॉ. ए. एन. सिंह ने दीप जला कर किया. इस पुस्तक मेले में प्रवेश निशुल्क हैं. पुस्तक मेले में स्थानीय तथा देश भर के ११५ प्रकाशको ने हिस्सा लिया हैं और किताबो के १६२ स्टाल लगे हैं.


विरचुअस पब्लिकेशन:सबसे अधिक बच्चो की पसंद

स्टाल्स पर प्रदर्शित नयी एवं पुरानी पुस्तकों से पुस्तक प्रेमी ना केवल रूबरू हो रहे हैं बल्कि अपनी पसंद की पुस्तके भारी तादाद में चुन और खरीद रहे हैं. मेले में खरीददारो की संख्या को देख कर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंटरनेट और ई-बुक्स के चलन के बावजूद भी हाथो में पुस्तक को पकड़ कर पढने का शौक आज भी लोगो में व्याप्त हैं. पुस्तक मेले में जिन प्रकाशको और पुस्तक विक्रेताओं की सक्रिय भागीदारी  हैं उनमे- गौतम बुक सेन्टर, पुस्तक महल, राकेश बुक एजेंसी, नंदा बुक सर्विस, जनचेतना, अक्स-ओ-आवाज़, आर्य प्रकाशन, पदम् बुक कम्पनी, विरचुअस पब्लिकेशन, मर्कानी मक्तबा इस्लामी पब्लिशर, संस्कृति संस्थान, राजा बुक्सप्रभात प्रकाशन, सामयिक प्रकाशन, राजकमल प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट हैं.

नेशनल बुक ट्रस्ट देश भर में पुस्तक मेलो का आयोजन करता आया है. इसका गठन जवाहर लाल नेहरु ने पुस्तकों को बढ़ावा देने के लिए किया था. सभी स्टाल्स पर अलग अलग विषयों पर विविधतापूर्ण किताबे हिंदी, अंग्रेजी वा उर्दू भाषा में उपलब्ध हैं. कोर्स से सम्बंधित किताबे, वेद, पुराण, कुरआन, कविताएं, कहानी संग्रह, विज्ञान एवं वातावरण से सम्बंधित किताबे, महापुरुषो के जीवन से सम्बंधित किताबे, रामायण, महाभारत, प्रेरणादायक पुस्तके उपलब्ध हैं. पुस्तक विक्रेता मेले की सुरक्षा व्यवस्था के इंतज़ाम से संतुष्ट दिखे.

नंदा बुक स्टाल के संजय कुमार कहते हैं " लखनऊ की जनता में किताबो के प्रति जो लगाव दिख रहा है वह बेहद सरहानीय हैं. मुझे अपने बुक स्टाल पर अच्छा रिस्पोंस मिल रहा है. मैं इस पुस्तक मेले का हिस्सा बन कर बहुत खुश हूँ." 
विक्रेता एजाज हसन कहते है "वह व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं. सूखी मिटटी के मैदान में कालीन ना  बिछे होने के कारण धुल मिट्टी स्टाल्स को गन्दा कर रही हैं और इससे मेले की शोभा भी कम हो रही हैं साथ ही कैंटीन की कोई उचित व्यवस्था न होने के कारण काफी दिक्कत हो रही हैं."

अपनी पसंद की किताबे  छाटते खरीददार
मेले में हर वर्ग के पुस्तक प्रेमियों की भारी तादाद से मेले की रौनक बढ़ी हुई हैं. छोटे बच्चे कामिक्स,कहानिया और कलर बुक्स खरीदने के इच्छुक दिखे. वही युवा वर्ग में चेतन भगत के उपन्यास, स्वतंत्रता सेनानियों की जानकारियों से सम्बंधित किताबे, जे.के रौलिंग की किताबो, और विश्व के सफल व्यक्तित्वों की आत्मकथाए  जैसे बराक ओबामा की आत्मकथा द ऑडिसिटी ऑफ होप, महात्मा गांधी की आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग, अब्राहम लिंकन, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अंबेडकर, हरिवंश राय बच्चन और मदर टेरेसा की आत्मकथा से सम्बंधित किताबो की मांग देखने को मिली.

दसवी कक्षा की आकांक्षा ने कहा " मैं इस पुस्तक मेले में आकर बहुत खुश हूँ क्योंकि मुझे कई अंग्रेजी की किताबे १०% की छूट के साथ हिंदी में आसानी से मिल गयी."
किताब के अन्दर वा बाहर छपे दाम
इस मेले में प्रेमी युवा जोड़ो की भीड़ मेले की रौनक को बढ़ा रही हैं. मेले में आये शोभित कहते है " इस वेलेनटाइन वीक में वो अपनी गर्लफ्रेंड के लिए कुछ लव स्टोरीस खरीदने की चाह को इस मेले में आसानी से पूरा कर रहे हैं."
गौतम बुक सेन्टर पर आये सौरभ थोड़े परेशान दिखे उन्होंने कहा " किताबो के अन्दर कम दाम छपे है लेकिन किताबो के पीछे अधिक दाम की स्लिप चिपका रखी गयी हैं."
नेशनल बुक ट्रस्ट के सहायक निदेशक मयंक सुरोलिया ने बताया की मेले में ९, १०, ११ फरवरी को  सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा. १३ फरवरी तक चलने वाले इस पुस्तक मेले में आप भी सुबह १० से शाम ८ बजे तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर किताबो का आनंद ले सकते हैं.

Wednesday, February 2, 2011

कल रात का ख्वाब

आज सुबह जब सो कर उठी सब कुछ हर रोज़ जैसा था. वही सूरज, वही चिडियों की चहक, वही माँ के हाथ की बनी हुई गरम गरम चाय और  वही मैं. कुछ बदला था तो वह थी मेरे आँखों की चमक. हर रोज़ सुबह उठने पर आँखों में कुछ पाने के सपने होते थे,ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की ललक होती थी पर आज जब उठी तो आँखों में नमी थी, कुछ बुरे ख्वाबो का दर्द था.
 
एक ख्वाब जिसने मेरे जीवन की एक खूबसूरत सुबह को खराब कर दिया और साथ ही साथ मुझे उस ख्वाब को हकीकत ना बनने देने की ओर आगे बढ़ा दिया सबकी तरह मेरी ज़िन्दगी के भी कुछ सपने हैं जिनको मुझे पूरा करना हैं. पर कल रात के ख्वाब में मैंने देखा की मैं अपनी ज़िन्दगी का कोई भी सपना सच नही कर पायी. मैं ज़िन्दगी में सब कुछ हार के एक समुन्द्र के किनारे तन्हा खड़ी हूँ. जहाँ कोई मुझे नहीं पहचानता, जहाँ सिर्फ मेरे साथ मेरी हार हैं.
 
इस सपने ने मुझे अपने बारे में सोचने पर मजबूर किया. ये सोचने पर मजबूर की जिन सपनो को मैं सच करना चाहती हूँ उनके सिर्फ ख्वाबो में अधूरे रहने से जब इतनी तकलीफ हो रही हैं तो अगर कहीं ऐसा हकीकत में हुआ तो वह वेदना कितनी अधिक होगी.
 
इस ख्वाब के बाद कई बातो का एहसास हुआ. लगा की क्यूँ मैं अपने क्लास को बंक कर के कैंटीन जाती हूँ, क्यूँ लाइब्रेरी में जाने वाले समय में दोस्तों के साथ तफरी करती हूँ, जब मैं देर रात तक जग कर पढाई नहीं कर पाती तो कैसे मैं देर रात तक दोस्तों से फ़ोन पर बात करती हूँ, क्यूँ जो एक आध घंटा मैं पढने का सोचती हूँ उस समय कहीं ना कहीं किसी काम से चली जाती हूँ, क्यूँ मेरा खुद पर कोई नियंत्रण नहीं हैं?
 
जवाब में कुछ अगर पा रही थी तो वो बस इतना की मैंने अपने और अपने सपनो को कभी केंद्र में रखा ही नहीं. कहने को तो मेरे पास सपने हैं पर उनको हकीकत में बदलने का जूनून हैं ही नहीं. मुझे खुद के सपनो को हकीकत में बदलने से ज़्यादा अपनी ज़िन्दगी को बईमानी खुशिया देने में मज़ा आ रहा हैं. मैं अगर कुछ समय के लिए अपनी ज़िन्दगी पूरी तरह से अपने सपनो को हकीकत बनाने के लिए सोचूं  तो उसके साथ साथ जो छोटी रूकावटे दिखती है वो इतना डरा देती हैं की मैं इस ओर सोचती ही नहीं और वापस अपनी बिन मतलब की ज़िन्दगी में मशगूल हो जाती हूँ.
 
पर अब यह एहसास हो गया की मेरी ज़िन्दगी इन चंद बईमानी खुशियों की मोहताज नहीं बल्कि मेरी ज़िन्दगी मेरे सपनो को हकीकत में बदलने का ज़रिया हैं. एक रात का ख्वाब जब इतनी तकलीफ दे सकता हैं तो क्यूँ मैं उस तकलीफ को अपनी असल ज़िन्दगी में बर्दाश्त करूँ.
 
मेरी ज़िन्दगी मेरी अपनी हैं और मैं इसे और चीज़ों से नियंत्रित नहीं होने दूंगी अब मेरे इर्द गिर्द की चीज़ों को मुझे अपने हिसाब से नियंत्रित करना हैं और अपने सपनो को  हकीकत में बदल कर अपने जीवन को साकार करना हैं.